छत्तीसगढ़ प्रदेशजगदलपुर

पक्षी मित्र अभियान, प्यासा कंठ चहचहाये कैसे ?

टाईगर रिजर्व प्रबंधन का कार्य भी संदेह के दायरे में

जगदलपुर। बस्तर संभाग के पश्चित बस्तर स्थित ईंद्रावती टाईगर रिजर्व में बाग मिलने की सुगबुगाहट, पूर्व में इस यहां पर कैंपा मद से करोड़ों रूपए खर्च किए गए और वन्य प्राणियों के नाम रखरखाव के नाम पर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया था। वर्तमान मेें एक ईमानदार छवि के अधिकारी को प्रभार दिया गया है। अब ईंद्रावती और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में देखना है कि केंद्र सरकार से प्राप्त कैंपा मद का दुरूपयोग क्या रूक पायेगा? माओवाद प्रभावित दोनों राष्ट्रीय उद्यानों में जंगलों की बेतहाशा कटाई तथा अंदर वालों की दखल से कुटरू तक ही जाना संभव हो पाता है। दूसरी ओर कांगेर वैली में सड़कों के निर्माण तथा, वॉच टावर बनाने में व्यापक तौर पर हेराफेरी की गई। माओवादियों के बिना इच्छा क्षेत्र में जाने की इच्छा रखने वाले पर्यटकों में दहशत का माहौल बना रहता है। कुटुम्बरसर गुफा जाने वाले वनमार्ग का आज तक रखरखाव में करोड़ों रूपए का खच दर्शाया गया साथ ही छत्तीसगढ़ से बीमार हिरण लाकर रखे गए थे, किंतु पशु चिकित्सकों तथा विशेषज्ञों के न होने के कारण यह योजना भी धराशायी हो गई। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार से प्राप्त राशि का दुरूपयोग चाहे दंतेवाड़ा वनमंडल अंतर्गत कैंपा मद से जंगली जानवरों के लिए क्या कुछ किया गया यह भी संदेह के दायरे में है।
छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय पक्षी बस्तर के पहाड़ी मैना विलुप्त होने का खतरा टल तो गया है कांगेर वैली नेशनल पार्क में 200 से ज्यादा पहाड़ी मैना देखे जाने के बाद 2007 में विभाग के जान में जान आई थी तेजी से घटती संख्या को देखते केंद्र सरकार ने बाघ वाइल्ड बेफेलो जैसे जानवरों की तरह शेड्यूल एके वन्य प्राणियों में शामिल किया है। जिसके तहत करोड़ों रूपए का फंड प्रदान किया गया। किंतु कांगेर रैली प्रबंधन द्वारा यह भी पता नहीं लगा पाई कि नर या मादा पहाड़ी मैना कितने है। विभाग ने मैना की प्लेनिंग के विकल्प पर विचार को महत्व नहीं दिया। गौरतलब है कि कांगेर रैली प्रबंधन द्वारा स्थानीय वन्य विद्यालय ने विशाल पिंजरा बनाया था जिसमें 4 मैना रखी गई थी। 75 लाख रूपए से ज्यादा के खर्च और देखभाल के व्यापक तौर पर फर्जी मस्टररोड बनाए गए। कुल मिलाकर यह पाया गया था कि 138 पेेंड़ों को चिन्हित किया जहां मैना के घोसले थे। और वे वहां भोजन करती थी। अवैध कटाई के चलते उनका पलायन तेजी से हुआ । यह इस बात से सिद्ध होता है कि अवैध कटाई के मामले में ग्रामीणों को पार्क पबंधन ने पकड़कर अदालत में पेश किया। यहां पदस्थ रहे परिक्षेत्राधिकारी अशोक सोनवानी तथा रामदत्त नागर जैसे शातिर रेंजरों ने केंद्र सरकार के प्राप्त राशि से अनेक फर्जी कार्यों को अंजाम देकर बंदरबाट में वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल किया। वर्तमान में पदस्थ पार्क निर्देशक ईमानदार छवि के कारण व्यवस्था में सुधार आया है किंतु पक्षी सर्वेक्षणों के इस कार्यक्रम में केंद्र सरकार से प्राप्त राशि से प्रचार पाकर नई कहानी गढ़ी जा रही है।

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