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वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम विज्ञापनों के झूठ की दुनिया किताबों में सहज है समस्या को हल करना लेकिन कठिन है इस पर अमल करना  

{इसमें क्या खास बात है…. महासमुंद, कांकेर में अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों को करोड़ों के ठेके दे दिये’ ये खबर छपी। लोग हंस दिये। ये भी कोई खबर है ? अधिकारी, अधिकारी बनते ही क्यों हैं ? कमाई के लिये, मिल-बांटकर खाने के लिये। अब पैसे देकर पोस्टिंग ली है तो पैसे उगाहेंगे नहीं क्या ? कमाई तो करंेगे न, काली ही सही। अब तो जनता इसे बड़े आराम से लेती है, सहज रूप से। यहां तक कि अब चुनाव में कोई पार्टी भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं बनाती, बेईमानी की बात ही नहीं करती। जनता भी जीवन भर बेईमान रहे अधिकारियों को रिटायरमेन्ट के बाद नेता भी चुन लेती है… }
दुर्ग के एक बड़े व्यापारी ने एक तेल की एजेंसी ली और पेपर में विज्ञापन दिया कि इसे लगाते ही दर्द गायब हो जाता है। यदि राहत न मिले तो खुली शीशी वापस। अपने धुरंधर ने भी रायपुर के एजेन्ट से एक शीशी खरीद ली। घर आकर मां को लगाई लेकिन दो -तीन बार लगाने से भी कोई खास राहत नहीं मिली तो रायपुर के एजेन्ट के पास शिकायत के साथ पहंुचे कि लीजिये आपके डिस्ट्रीब्यूटर के विज्ञापन के हिसाब से खुली शीशी भी आपको वापस लेनी है। रायपुर के एजेन्ट ने साफ इन्कार कर दिया। जब उसे विज्ञापन बताया गया तो वो लगा गिड़गिड़ाने कि भैया हमको ऐसा कोई निर्देश कंपनी से नहीं आया है। यानि साफ तौर पर वो झूठा विज्ञापन था।
अर्सा पहले एक कार्यक्रम में हेमा मालिनी आई थीं। जब पत्रकारो नं पूछा कि क्या आप लक्स से नहाती हैं तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। यानि जिस लक्स से नहाते हुए वे टीवी पर दिख जाती थीं वास्तव में वे उससे नहीं नहाती थी। यानि यहां भी झूठ, झूठ विज्ञापन का, हेमा मालिनी ने तो साफ तौर पर मना कर दिया।
थोड़ा ही समय पहले एक अमेरिकी इलेक्ट्राॅनिक सिगरेट बनाने वाली कंपनी ने भी झूठा विज्ञापन दिया इस विज्ञापन का परिणाम युवाओं के लिये नुकसान के रूप में सामने आया जिस पर कई लोगों ने मुकदमा दायर कर दिया और कंपनी को 14 हजार करोड़ रूप्ये जुर्माना भरना पड़ा। हमारे देश में किसी धनी से, रसूख वाले से जुर्माना भरवाना कतई आसान नहीं है इसलिये कोई हिम्मत नहीं करता।
वैसे सरकार ने झूठे विज्ञापनों के लिये उत्तरदायित्व ठहराने संबंधी कानून बना दिये हैं और यदि कोई सेलिब्रिटी झूठा प्रचार करता पाया जाता है तो उसे जुर्माना भरना होगा। कितना अच्छा लगा सुनने में और कितना कठिन है इसे अमल में लाना। कमोबेश हर विभाग में यही हाल है।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
mo. 9522170700
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