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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, धरना प्रदर्शन और राजनीति में नेताओं को चुडियाँ भेंट करने की खबरे अक्सर सुर्ख़ियो बटोरती है

अक्सर देखने सुनने को मिलता है कि अमुक अधिकारी या नेता को फलाने फलाने ने चुडियाँ भेंट की या उनपर फेंकी । जब मैं बेमेतरा जो अब जिला मुख्यालय बन चूका है के साइंस कालेजके बीएससी की पढाई कर रहा था तब उस दौर में भी सन् 1990-91 मे कांग्रेस के दबंग नेता कांग्रेस के पितृपुरुष स्वर्गीय मोतीलाल वोरा को साइंस कॉलेज के छात्र छात्राओं ने चुडियाँ भेंट की थी । तब मैं भी चूड़ी भेंट करने को अकर्मण्यता और कमजोरी का प्रतिक समझता था परंतु मन में महिलाओ की कलाईयों का श्रृंगार , सुहाग के प्रतिक चूड़ी पर बने जुमले को ले कर काफी समय से विचार आ रहा है कि * काम नहीं कर सकते तो चूड़ी पहन लो * का जुमला क्यों बना है? ये मैं आज तक नहीं समझ पाया ।

बदलते समय के साथ अब यह अटल सत्य है कि इन्हीं चूड़ीदार हाथों के बिना गृहस्थी और दुनियादारी का पहिया चलना कठिन ही नहीं असंभव भी है। आज यही चूड़ी पहनने वाले हाथ पुरुषो के कंधे से कंधा मिला कर काम कर रहे है । चाहे काम घर के अंदर का हो या घर के बाहर का हो । महिलाएं चूल्हे चौके से मंगल तक पहुंच चुकी है । वैसे देखा जाय तो आज तक गृहणियों के कार्यो और उनकी मेहनतकशी का कोई मोल नहीं लगा पाया है । हाल यह है कि मर्दों को लड़ाई भी महिलाओं की गाली के बिना मुकम्मल नही होती ऊपर से विडम्बना ये कि सभ्य समाज में गृहस्थी के कार्य को कार्य नहीं माना जाता परंतु यह भी अटल सत्य है कि इन चूड़ी पहनने वाले हाथो के बिना घर गृहस्थी के पहिये की गाडी खीची नहीं जा सकती । तो क्या अब चूड़ी पहन लो का जुमला बदला नहीं जाना चाहिए ? क्या आम गृहणी के कार्यो का कोई मोल नहीं है ?

और अंत में :-
क्या खूब कहा है औरत ने ,
उसे जरूरत भी मेरी है ,
और कमजोर भी मुझे ही समझता है ।

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