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वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम ,सीधे रस्ते की टेढ़ी चाल ,,, सरकारी लोग बेहिसाब ‘खाते’ हैं नेता उन्हें ट्रांसफर से बचाते हैं बेईमानो ने ओढ़ी राजनीति की चादर है पाल रखा सबने एक-एक गॉड फादर है

0 जवाहर नागदेव                                      

सरकारी लोग बेहिसाब ‘खाते’ हैं
नेता उन्हें ट्रांसफर से बचाते हैं
बेईमानांे ने ओढ़ी राजनीति की चादर है
पाल रखा सबने एक-एक गॉड फादर है

आज विजय दिवस है। बात की शुरूआत करेंगे आज के दिन 16 दिसंबर से। 1971 मेें आज ही के दिन पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करके अपनी जान बचाई थी। भारत से करारी मात खाकर पूर्वी पाकिस्तान अलग हुआ और बांग्ला देश बना। तब से विजय दिवस के रूप् में ये दिन मनाया जाता है। कदाचित् सीधे युद्ध में बार-बार पराजित होने की चिढ़ ही है कि पाकिस्तान आतंकवाद के रूप में हमसे उलझता रहा है और खुशी की बात ये है कि पिछले कुछ सालों में हमने उसके हर मोर्चे का मुंहतोड़ जवाब दिया है जिससे उसकी छाती फटी पड़ी है। जयहिन्द।

डर न कोर्ट का
न भगवान का

देश मे माहौल खराब करने में सरकारी नेता और सरकारी अधिकारी सबसे अधिक जवाबदार हैंं। सरकारी नेता याने जो सरकार में हैं। इन्होंने हमेशा मन की मानी कोर्ट की नहीं मानी। मन की हमेशा ‘मनी’ के लिये मानी और अधिकारी ‘मनी’ के सहारे रहे मनमानी। हर सप्ताह ऐसी खबर पढ़ने को मिल ही जाती है कि किसी अधिकारी ने कोर्ट के आदेश को भी दरकिनार कर दिया और मनमानी की। बाद मंे यदि उन पर कार्यवाही का आदेश हुआ भी तो कार्यवाहीे करने वाली सरकार ने ढिलाई बरती। यानि सत्तासीन नेताओं ने संरक्षण किया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकम्पा नियुक्ति के एक मामले मंे कोर्ट के आदेश को न मानने के लिये अधिकारियों के विरूद्ध अवमानना का मामला बनाया है और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की ओर इशारा भी किया कि जिस काम को सरकारें अपने मतलब का समझती हैं उसे आनन-फानन में अंजाम तक पहुंचाा देती हैं और जिसमें उन्हें असुविधा होती है तो उसे सालोंसाल लटका कर रखती हैं, चाहे उसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही क्यांे न हो। 16 साल हो गये सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को जिसमें पुलिस सुधार के तहत डीजीपी और एसपी का कार्यकाल दो साल तय करने को कहा गया था जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ।

जवाहर नागदेव                                      0 वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,चिंतक,विश्लेषक

सीधे रस्ते की टेढ़ी चाल

हाल में नये चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिये सरकार इतनी मुस्तैद दिखी कि हर स्तर पर क्लीयर करके अंजाम तक पहुंचाने में मात्र एक दिन लगा। दूसरी ओर पुलिस सुधार जैस कई अतिआवश्यक जन हितैषी कामों को बरसांे बरस लटका कर रखा जाता है।

केेजरीवाल बिज़ी
टेक इट ईज़ी

बड़े खुश हैं केजरीवाल।
बड़े दुखी हैं केजरीवाल।
बड़े बौराए हैं केजरीवाल।
बड़े चौकन्ने हैं केजरीवाल।
दिल्ली में नगर निगम मे पार्षदों की फौज खड़ी कर दी। कांग्रेस की भद्द पिट गयी। सबसे बड़ी खुशी भाजपा को हरा दिया। लेकिन ये क्या भाजपा ने उन्हे डरा दिया। बड़े दुखी हैं केजरीवाल। समझ नहीं पा रहे कि रोएं या हंसंे। भाजपाई कह रहे है कि पार्षद बेशक आपके ज्यादा हैं    मगर मेयर तो हमारा होगा। मेयर का चुनाव पार्षद करेंगे। और जाहिर है कि अमित शाह जोड़-तोड़ में माहिर हैं। तो बड़े बौराए हैं केजरीवाल। एक तो सबसे बड़ा पेंच ये है कि दिल्ली नगर निगम के वित्तीय अधिकार कंेद्र सरकार के पास हैं। ऐसे में जनता सहित चुने हुए पार्षद भी ये जरूर सोचते होंगे कि मेयर ‘आप’ का बन गया तब भी कर क्या लेगा। या तो मोदीजी के आगे झोली फैलाएगा या फिर केवल कोसते रहेगा कि ‘ये लोग हमको काम नहीं करने देते जी’।
केजरीवाल को डर सता रहा है कि कुछ पार्षद यदि क्रॅास वोटिंग कर देंगे और मामला बिगड़ जाएगा। उपर से ये हवा जरूर उड़ा रहे हैं कि हमारे पार्षद बिकाउ नहीं हैं जी। पर अंदर से उनकी खुद की हवा खराब है। निश्चित रूप से कुछ आम आदमी पार्टी के पार्षद ये अवश्य सोच रहे होंगे कि इस वोटिंग मंे भाजपा से संबंध मधुर कर लो। जाने कब बाजी पलट जाए। पहले जैसा माहौल नहीं रहा कि केजरीवाल एकतरफा जीत हासिल कर लंे। दिल्ली विधानसभा पर भाजपा का कब्जा होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। वैसे दिल्ली की कांग्रेस ‘आप’ से कोई खास प्रसन्न नहीं है। कांग्रेसी पार्षद भी भाजपा की ओर पलट सकते हैं। हालांकि फिलहाल भाजपा ने मेयर बनाने के प्रति अपना कोई इरादा जाहिर नहीं किया है, उदासीन सी है। लेकिन केजरीवाल की नींद गायब है। पार्षदो पर नजरें गड़ाए हुए हैं। वास्तविक स्थित तो चुनावी घोषणा होने के बाद सामने आएगी। हम तो केजरीवाल से बस इतना ही कहेंगे ‘टेक इट ईज़ी’।

 

सरकारी बनकर जान से खेलें
प्राईवेट बनकर सारा धन ले लेंउपर दूसरे लोक में एक सभा हुई जिसमें नीचे के लोक के बहुत से डॉक्टरों को सम्मानित किया गया। पूछने पर पता लगा कि ये सरकारी डॉक्टर थे जिन्होंने यमराज की बहुत मदद की। यानि मरीजांे को सीधे दूसरे लोक पहुंचा दिया। लेकिन ये देख कर आश्चर्य हुआ कि इन्हीं के इलाज से कई लोग स्वस्थ भी हो गये थे। हालांकि इस स्वास्थ्य के लिये उनके परिजन गले-गले तक कर्जे में आ गये और अब वे बीमार पड़ने लगे हैं।
वस्तुतः डॉक्टरों की पैसों के लिये गिरने की कोई हद तय नहीं है। जिस लेबल तक गिरना हो गिर सकते हैं और अपनी तिजोरी के लिये माल इकट्ठा करते हैं। आखिर क्यांे न करें। सरकार भी तो उनसे पढ़ाई के नाम पर लाखों रूप्ये वसूलती है जिसे ये निकालेंगे कहां से ?
माल के लिये इंसान को इंसान नहीं समझने वाले डॉक्टरांे की पोल एक बार फिर खुल गयी। जब अंबिकापुर में मेडीकल कॉलेज अस्पताल में 4 बच्चों की मौत लापरवाही के चलते हुई । मामला मंत्री जी के संज्ञान में लाया गया तो जांच होने पर पता चला कि आमतौर यहां पर ऐसा स्टाफ सक्रिय रहता है जो परिजनों को सरकारी अस्पताल से नवजात शिशुओं को प्राईवेट डॉक्टरों के पास ले जाने की सिफारिश करता है। जाहिर है इन प्राईवेट नर्सिंग होम के तार इन सरकारी डॉक्टरों से जुड़े होते हैं जिनकी ड्यूटी सरकारी अस्पतालों मंे नवजात शिशुआंे का इलाज फोकट में करना होता है।
– लामा – जब परिजनों को उकसा कर डरा कर प्राईवेट मंे भेंजने का माहौल तैयार करने के बाद जब शिशु को डिस्चार्ज करते हैं तो उसकी रिपोर्ट में लिखते हैं ‘लामा’। यानि ‘लेफ्ट अगेन्स्ट मेडीकल एडवाईस’ अर्थात् (अन्य) मेडीकल सलाह के लिये छोड़ा। बस इस लामा ने ही इनके पाप को थाम रखा है। सरकारी कागजों में ये नहीं लिखते कि हम अपनी तरफ से बच्चे को निकाल रहे हैं। बल्कि ये जताते हैैं कि शिशु के परिजन किसी अन्य डॉक्टर से सलाह लेना चाहते जिसके लिये उन्हें छुट्टी दी जा रही है।     

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