नरेंद्र बंजारे, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अवैध कारोबार का जाल दिनोंदिन गहराता जा रहा है। जहां एक ओर अवैध रेत भंडारण और इंजल ऑइल जैसे व्यापार प्रशासन की आंखों में धूल झोंकते हुए पनप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उरला औद्योगिक क्षेत्र में खुलेआम अवैध झिल्ली फैक्ट्री संचालित हो रही है — जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2021 की सीधी अवहेलना है।

इस लिये बैन किया गया
1. पर्यावरण प्रदूषण :
सिंगल-यूज प्लास्टिक का बड़ी मात्रा में उपयोग होने के कारण कचरा और प्रदूषण फैलता है, और इसका उचित पुनर्चक्रण नहीं होता है.
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन :
प्लास्टिक के उत्पादन और दहन से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं.
समुद्र प्रदूषण :
प्लास्टिक के टुकड़े महासागरों में जाकर समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं, और माइक्रोप्लास्टिक मानव खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करते हैं.
2. वन्यजीवों को नुकसान :
नुकसान:
जानवर अक्सर प्लास्टिक की वस्तुओं को निगल लेते हैं या उनमें फंस जाते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है.
माइक्रोप्लास्टिक :
प्लास्टिक के छोटे टुकड़े समुद्री जीवन के लिए हानिकारक होते हैं, क्योंकि वे उन्हें भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं.
3. मानव स्वास्थ्य के लिए खतरे:
बीपीए (BPA):
कुछ सिंगल-यूज प्लास्टिक में बीपीए होता है, जो हार्मोनल असंतुलन और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है.
अन्य रासायनिक पदार्थ:
प्लास्टिक में अन्य रासायनिक पदार्थ भी होते हैं, जो मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं.
4. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव:
वित्तीय लागत:
प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन और प्रदूषण को दूर करने की जिम्मेदारी सरकारों और समुदायों पर पड़ती है.
प्राप्त जानकारी के अनुसार, क्राइम छत्तीसगढ़ और खबर No.1 की संयुक्त टीम जब इस अवैध फैक्ट्री की हकीकत जानने मौके पर पहुंची, तो फैक्ट्री के अंदर का मंजर देख सभी स्तब्ध रह गए। नियमों के अनुसार, 75 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक कैरी बैग का निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है। बावजूद इसके, इस फैक्ट्री में भारी मात्रा में ऐसी प्रतिबंधित झिल्लियों का उत्पादन जारी है।
सबसे गंभीर बात तब सामने आई जब पत्रकारों ने इस विषय पर रिपोर्टिंग करनी चाही। फैक्ट्री के मालिक और उनके दो बेटों ने टीम को धमकाया, और फिर उनका वीडियो बनाकर किसी अज्ञात व्यक्ति को भेजा। वीडियो के जरिये पत्रकारों को डराने और “देख लेने” की धमकी दी गई। इस पूरे मामले की शिकायत उरला थाने में तत्काल दर्ज करवाई गई है।
यह सवाल उठाना लाज़िमी है कि क्या यह अवैध फैक्ट्री शासन और प्रशासन की मिलीभगत के बिना इतने वर्षों तक चल सकती थी? स्थानीय सूत्रों का दावा है कि फैक्ट्री मालिकों को कुछ प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, जिससे इनके हौसले बुलंद हैं और वे कानून को खुलेआम ठेंगा दिखा रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस अवैध गतिविधि पर क्या ठोस कार्रवाई करता है, या फिर हमेशा की तरह कुछ भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा मामले को दबाकर पत्रकारों पर ही सवाल उठाए जाते हैं।
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