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कांकेर में बढ़ते धर्मांतरण मामलों के बीच 20 गांवों में ईसाई समुदाय का प्रवेश किया वर्जित

कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में बढ़ते ईसाई धर्मांतरण मामलों के बीच 20 गांव के समाज प्रमुखों ने सुलगी गांव में अहम बैठक की, जिसमें धर्मांतरण से प्रभावित हो रही आदिवासी रीति-रिवाज को संरक्षित करने के लिए चर्चा की गई। बैठक में ईसाई समाज के लोगों का गांव में प्रवेश वर्जित करने का फैसला किया गया। इसके लिए ग्राम सभा में बकायदा प्रस्ताव पारित कर सुलगी के प्रवेश द्वार में बोर्ड भी लगा दिया गया है।

ग्राम सुलगी के प्रवेश द्वार में लगाये गये बोर्ड में ग्रामीणों ने लिखा है, कि पेशा अधिनियम 1996 लागू है, जिसके नियम चार घ के तहत सांस्कृतिक पहचान और रुढ़ीवादी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आदिवासियों को प्रलोभन देकर उनका ईसाई धर्मांतरण कराना हमारे संस्कृति को नुकसान पहुंचाने के साथ आदिम संस्कृति को खतरा है। ग्राम सभा के प्रस्ताव के आधार पर सुलंगी गांव में ईसाई धर्म के पास्टर, पादरी और बाहर गांव से आने वाले ईसाई धर्मांतरित व्यक्तियों का धर्मिक और धर्मांतरण आयोजन के उद्देश्य से प्रवेश पर रोक लगा दिया गया है। इसके लिए गांव के प्रवेश द्वार पर एक बोर्ड लगाया गया है।

उल्लेखनीय है कि जिस सुलंगी गांव में बैठक हुई उस गांव में 16 परिवार के लोग ईसाई धर्म को मानने लग गए हैं, जिसमें दो परिवार को वापस मिलाया गया है, जब कि 14 परिवार अभी भी दूसरे धर्म का अनुसरण कर रहे हैं। जिसके चलते गांव के आदिवासी समाज के रीति रीवाजें प्रभावित हो रही हैं, साथ ही गांव का माहौल भी खराब हो रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि यह विरोध ईसाई धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि गांव के भोले-भाले आदिवासी लोगों का हो रहा ईसाई धर्मांतरण के खिलाफ है।

उल्लेखनीय है कि कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम कुडाल में ग्रामीणों ने इसकी शुरुआत की थी, जहां ग्रामीणों ने गांव के चारों ओर एक-एक बोर्ड लगाया गया है। जिसमें पास्टर और पादरी को गांव में घुसने को पूर्णतः प्रतिबंध किया गया है। कांकेर जिले में पहला गांव कुडाल है, जहां लगभग 9 ईसाई धर्मांतरित परिवार हैं, लगभग एक माह पहले ईसाई धर्मांतरित परिवार की एक महिला की मौत के बाद कफन-दफन को लेकर गांव में बवाल मचा था। जिसके बाद ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर पास्टर-पादरी का गांव में प्रवेश सख्ती से रोक दिया था। ग्राम सभा ने यह फैसला भारतीय सविधान की पांचवी अनुसूचि में दिए गए अधिकार के तहत लिया, इसमें ग्राम सभा के पास अपनी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षित करने निर्णय लेने का अधिकार मिलता है।

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