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शास्त्रीय नियम के अनुसार दान करने से ही वास्तविक पुण्य की प्राप्ति होती है- स्वामी राजीव लोचन

*मनुष्य को नहीं गौमाता के लिए दान की आवश्यकता*

कवर्धा। श्री रुद्र महायज्ञ, श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह, श्री रामकथा, स्वामी रामदेव योग शिविर के चौथे दिन व्यासपीठ से स्वामी राजीव लोचन दास जी महाराज ने कहा कि राजा बलि और वामन अवतार के प्रसंग में प्रकाश डालते हुए यह बात विचारणीय है कि लेने वाला यदि छल कर रहा है और देने वाला निश्छल है। यहाँ दान की प्रक्रिया भी धर्म संगत नहीं है, क्योंकि दान करने का कुछ शास्त्रीय नियम बताया गया है। उस नियम के अनुसार दान करने से ही वास्तविक पुण्य की प्राप्ति होती है।

श्री गणेशपुरम कवर्धा में गणेश तिवारी आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह के दूसरे दिन आचार्य राजीव लोचन ने कहा कि देने वाला यह विचार करे कि जो वस्तु वह दान कर रहा है वह न्याय संगत प्रक्रिया से अर्जित किया गया हो। दूसरा उचित काल में उस वस्तु का दान किया गया हो, तीसरा उचित व्यक्ति को उचित उद्देश्य के लिए दान दिया गया हो। ये सारी प्रक्रियाएँ जहाँ पर एक साथ दिखाई दें, उसे दान कहा जाता है।

भगवान वामन ने उचित स्थान, काल और व्यक्ति से दान लिया किंतु प्रक्रिया गलत थी। छलपूर्वक तीन पग के बदले तीनों लोक को लेना न्यायोचित नहीं था।

फिर भी राजा बलि ने दान दिया क्योंकि उद्देश्य उचित था। इन बिंदुओं पर हम लोग विचार करें तो सनातन सुरक्षित होगा।

आज मनुष्य को भोजन और आवास की कोई असुविधा नहीं है, लेकिन गौमाता जो धर्म की मूल है वह भोजन और आवास के लिए जूझते हुए सड़कों पर बेमौत मारी जा रही है और धर्म के मूल को न समझने वाले उसी गौ माता की चर्बी से बने डुप्लीकेट घी से बनाया भोज का भंडारा करा रहे हैं। जबकि वास्तविक भण्डारा गौ माता के लिए होनी चाहिए। इसलिए दान की आवश्यकता मनुष्य को नहीं है। दान का उचित पात्र गौ माता को होनी चाहिए।

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